देश की मूल संस्कृति के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट, दीवाली पटाखे, दही-हांडी के बाद एक और औरंगजेबी फरमान?

देश में वामपंथियों और मजहबी कट्टरपंथियों ने जबरदस्त ग़दर मचाया हुआ है. पहले असहिष्णुता का ड्रामा और उसके बाद लव जिहाद का बचाव करने वाले पाखंडियों को लगता है अब हिन्दुओं के सांस लेने तक से परेशानी होने लगी है. अब बच्चों तक को निशाना बनाया जाने लगा है. सुप्रीम कोर्ट ने ऐसी ही एक याचिका पर सुनवाई करते हुए उसे रद्द करने की जगह उलटा सरकार से ही सवाल कर दिए हैं.

बच्चों के प्रार्थना करने से परेशानी




दरअसल विनायक शाह नाम के एक वकील की भावनाएं अब इसलिए आहात होने लगी हैं कि केंद्रीय विद्यालयों में बच्चे संस्कृत में प्रार्थना क्यों करते हैं. इसने सुप्रीम कोर्ट में याचिका डालते हुए दलील दी है कि केंद्रीय विद्यालयों में होने वाली प्रार्थना हिंदुत्व को बढ़ावा देती है और सरकार द्वारा चलाए जा रहे स्‍कूलों में ऐसा नहीं जाना चाहिए.

यहाँ मजे की बात देखिये कि जिस देश में करोड़ों संगीन अपराधों के केस पेंडिंग हों, वहां ऐसी बेमतलब की वामपंथी सोच वाली याचिका को सुप्रीम कोर्ट ने रद्द करने की जगह ना केवल सुनवाई के काबिल समझा बल्कि केंद्र की मोदी सरकार से ही जवाब तलब कर लिया है.

सुप्रीम कोर्ट को मिला एक और मौक़ा

केंद्रीय विद्यालयों में होने वाली प्रार्थनाओं को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को नोटिस भेजा है. इन तमाम सवालों के जवाब कोर्ट ने 4 हफ्ते में तलब किये हैं. वकील ने याचिका में कहा है कि ये संविधान के अनुच्छेद 25 और 28 के खिलाफ है और इसे इजाजत नहीं दी जा सकती है. कानूनन राज्यों के फंड से चलने वाले संस्थानों में किसी धर्म विशेष को बढ़ावा नहीं दिया जा सकता.

हालांकि इन वकील साहब को उन मदरसों से कोई आपत्ति नहीं है, जो सरकारी पैसों से चलते हैं लेकिन कुरान की आयतें पढ़ाते हैं. इन्हे उन कान्वेंट स्कूलों से कोई दिक्कत नहीं, जिनके अंदर ही चर्च बने होते हैं और फादर प्रार्थना करवाते हैं.
मगर केन्द्रीय विद्यालयों में होने वाली संस्कृत की ये प्रार्थना, इन्हे बेहद तकलीफ पहुँचाती है.




असतो मा सदगमय!
तमसो मा ज्योतिर्गमय!
मृत्योर्मामृतं गमय!

वहीँ सुप्रीम कोर्ट ने एक कदम आगे बढ़ाकर इसे एक गंभीर संवैधानिक मामला करार दिया है और केंद्र सरकार से जवाब माँगा है. इसके बाद सुप्रीम कोर्ट यह फैसला करेगा कि क्या वास्तव में देशभर में स्थित 1100 केंद्रीय विद्यालयों में की जाने हिंदी प्रार्थना हिंदुत्व को बढ़ावा देती है और क्‍या यह संविधान का उल्लंघन करती है.

दीवाली, होली, दही-हांडी, जल्लिकट्टु के बाद प्रार्थना पर भी लगेगा बैन?

वैसे जिस तरह से दीवाली के पटाखों, होली के रंगो, दही-हांडी के आयोजन और बैलों की रेस से सुप्रीम कोर्ट को दिक्कत होती आयी है, उसे देखते हुए ये साफ़ है कि जल्द ही केंद्रीय विद्यालयों से ये प्रार्थनाएं भी गायब हो जाएंगी.






हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर कभी विचार नहीं किया कि भारत की मूलभूत संस्कृति ही हिन्दू संस्कृति है और शायद इसीलिए अदालतों में आज भी गीता पर हाथ रखकर कसम खिलवाई जाति है, किसी अन्य पुस्तक पर नहीं.

वैसे जहाँ एक ओर जर्मनी, अमेरिका जैसे देशों में संस्कृत के महत्व को समझते हुए उस पर रिसर्च किये जा रहे हैं, वहां अपने ही देश में वामपंथियों को संस्कृत से दिक्कतें होने लगी हैं, क्योंकि वामपंथी अच्छी तरह जानते हैं कि संस्कृत सभी समुदायों को एक सूत्र में जोड़ती है और बिना देश को तोड़े तो इनकी राजनीति हो नहीं सकती, इसलिए संस्कृत के खिलाफ ही सारे द्रोही लामबंद हो गए हैं.

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